लेखक : हरिमोहन झा

मुंशी नौरंगीलालकें शुरूएसॅं जासूसी उपन्यास पढबाक शौक रहैन्ह। चन्द्रकान्ता, भूतनाथ, मायामहल, पढैत-पढैत हुनको जासूस सनक सवार भऽ गेलैन्ह। और संयोग एहन जे बी.ए. क तिलिस्म तोड़ला उत्तर काजो तेहने भेटि गेलैन्ह। नौरंगीलाल दरोगा भऽ गेलाह।

दरौगा नौरंगीलालकें अपना बुधियारीक हदसॅं बेशी दाबी रहैन्ह। ओ कड़ा-कड़ा मोंछ रखने रहथि और बराबरि ओहिपर ताव फेरैत रहथि। हुनक सिद्धान्त रहैन्ह जे स्त्री- जातिक कोनो विश्वास नहि, तैं विवाह नहि करी। परन्तु जखन चारूकातसॅं बहुत दबाव पड़लैन्ह, त बहुत ठोकि बजा कऽ एकटा सुन्दरीक पाणिग्रहण कैलन्हि। दरोगाजी अपने तीससॅं ऊपर रहथि और वधू रहथिन्ह षोडशी। अतएव ओ जखन बाहर जाथि तखन डेरामे बाहरसॅं ताला लगा कऽ और कुंजी अपना संगे नेने जाथि।

स्त्री-चरित्रक कोनो ठेकान नहि। तैं अपना परोक्षमे दाइयो काज करऽ अबैन्ह से हुनका मंजूर नहि। किऎक त 'आदौ वेश्या ततौ दासी पश्चात् भवति कुट्टिनी!' के जाने ओ ककर दूती बनि कऽ आबय? अतएव जखन दरोगाजी डेरामे आबथि तखन बैसि कऽ अपना सामने चौका-बर्तन कराबथि।

नववधूक नाम रहैन्ह चंचला। ओ हॅंसमुख ओ विनोदिनी रहथि। ओना बन्द घरमे रहब हुनका जेल जकाँ बुझि पड़ैन्ह। किछु दिनक हेतु मुंशीजीक बहिन सरयूदाइ आबि गेलथिन्ह। तखन चंचलाके कतहुसॅं प्राण ऎलैन्ह। ननदि संग हॅंसथि-बाजथि। हुनकर बच्चाक संग खेलाथि। आनन्दसॅं समय कटि जाइन्ह।

परन्तु आङनमे एहि तरहक रंग-रभस दरोगाजीके पसिंद नहि पड़लैन्ह। ओ दसे दिनक बाद बहिनके विदा कऽ देलन्हि।

पुनः वैह सुनसान भूतक डेरा! चंचला देवीकें घर काटय लगलैन्ह। बाहर सॅं ताला बन्द। ककरा संग गप्प करथु? चुपचाप खिड़कीपर बैसलि अपना कर्मक विवेचना कैल करथि। जखन रातिमे दरोगाजी अबथिन्ह तखन ओ मनुष्यक दशामे आबथि।

एक राति चंचला कहलथिन्ह-एना मन नहि लगैत अछि। छोटकी दाइकें फेर बजा लिऔन्ह।

दरोगाजी कहलथिन्ह-हूँ।

चंचला कहलथिन्ह-अहाँ नहि बजैबैन्ह, त हमहीं लीखि दैत छिऎन्ह।

दरोगाजी फेर बजलाह-हूँ।

परन्तु हुनक मनमे संदेह भऽ गेलैन्ह। जरूर एहिमे कोनो रहस्य हैतैक। स्त्रियश्चरित्रं पुरुषस्य भाग्यं दैवो न जानाति कुतो मनुष्यः।

ओहि दिनसॅं ओ और विशेष रूपसॅं सावधान रहय लगलाह। चंचलाक प्रत्येक गतिविधिकें सूक्षम दृष्टिसॅं विश्लेषण करय लगलाह।

एक राति चंचला कहि उठलथिन्ह-अहाँक मोंछ हमरा गरैत अछि। कटा किऎक नहि लैत छी?

दरोगाजी ताव फेरैत कहलथिन्ह-यैह मोंछ त नौरंगीलालक शान छैन्ह। ई ताही दिन कटाएत जाहि दिन हमर जासूसी फेल कऽ जायत।

चंचला करौट फेरि कऽ सूति रहलीह। परन्तु नौरंगीलालकें संदेह भऽ गेलैन्ह-एकरा ई इच्छा किऎक भेलैक?

दरोगाजीक मनमे सन्देहक भूत जमि गेलैन्ह। ताहि दिनसॅं ओ और चौकस भऽ गेलाह। आब नीक जकाँ जासूसी करक चाही। ई हमरा परोक्षमे कोन तरहें रहैत अछि? की करैत अछि?

दोसरा दिन दरोगाजी कहलथिन्ह-हमरा एक चोरीक तहकीकात करक अछि। आइ राति डेरापर नहि आयब। ओहि राति चंचलाके निन्द नहि पड़लैन्ह। डेरामे केओ दोसराइत नहि, आर जेठक गर्मी। कौखन उपन्यास पढथि, कौखन खिड़कीपर जा कऽ बैसथि। कोनहुना कच्छ-मच्छ करैत प्रात कैलन्हि।

ओम्हर आधा रातिक बाद मुंशी नौरंगीलाल वेष बदलि कऽ अपना डेराक सामने ऎलाह त देखैत छथि जे धर्मपत्नी खिड़कीपर बैसलि छथि। ककरो प्रतीक्षामे तेहन तल्लीन भेलि छथि जे आँचरोक सुधि नहि! आधा देह ओहिना उघारे छैन्ह। सामने त मरौत काढैत रहै छथि और एखन डाँड़सॅं ऊपर नूए नहि!

दरोगाजीक सन्देह विकराल रूप धारण कैलकैन्ह। ओ दोसरा दिन गुप्त रूपसॅं खिड़कीक परीक्षा कैलन्हि! बूझि पड़लैन्ह जे एकटा छड़ ढिल-ढिल करैत अछि। केओ चाहय त ओकरा उखाड़ि कऽ भीतर आबि सकैत अछि और पुनः लगा दऽ सकैत अछि।

दरोगाजी मोंछपर ताव देलन्हि-आब सूत्र भेटि गेल। जौ बिना पता लगौने रहिऎन्हि त हमर नाम मुंशी नौरंगीलाल नहि।

तहियासॅं दरोगाजी आधा राति बिता कऽ घर आबय लगलाह। कहियो ने कहियो त चोर पकड़ाइए जायत! और एकदिन सरिपहुँ मुंशी नौरंगीलालक जासूसी सुतरि गेलैन्ह। करीब बारह बजे रातिक अंदाज ओ अपना घरक पछुआड़मे ठाढ भेल रहथि। चोर जकाँ कान पथने। एम्हर-ओम्हर तजबीज करैत। तावत एक मोड़ल कागजपर हुनक नजरि पड़ि गेलैन्ह।

ओ लपकि कऽ ओकरा उठौलन्हि और टार्चक रोशनीमे ओकरा पढय लगलाह। पढैत-पढैत दरोगाजी मोंछपर ताव फेरैत खुशीसॅं उछलि पड़लाह-यह मारा! चोर पकड़ लिया!!

ओ पुर्जी एक नमडोरिया स्लिपपर लिखल छलैक और चंचला देवीक हस्ताक्षर छलैन्ह, ताहिमे त कोनो संदेहे नहि।

पाठकक उत्सुकता शान्त करबाक हेतु चिट्ठीक हुबहू नकल नीचाँ देल जाइत अछि।

                             परम प्रिय
            सप्रेम     आलिंगन    और
            बारंबार       मुख    चुम्बन
            हम          अहाँक   ऎबाक
            बाट      ताकि  रहल    छी।
            बारह   बजे   रातिक   बाद
            अहाँ       आबि     जाउ  ।
            हम      व्याकुल         छी।
            राति          दिन     विचित्र
            पागल       भेल         रहैत
            छी         अहाँकें       हृदय
            मे         साटबाक        हेतु
            काल्हि      सँ    छटपटाइत
            छी । अहाँ  सँ  मिलक  हेतु
            छाती  धरकि  रहल   अछि।
            हम लाज खोलिकऽलिखै छी
            अहाँ आबि कऽ प्राण बचाउ।
            हम     खिड़की  पर  बैसलि
            रहब ।  विशेष भेंट  भेलापर
                                      अहाँक
                                      चंचला
                                      १४-३
                

दरोगाजी कैं जेना तिलिस्मक कुंजी हाथ लागि गेलैन्ह। यत्न-पूर्वक जेबीमे राखि लेलन्हि। तारीख देखलन्हि त 14 मार्च! अर्थात अजुके वादा थीक। आब समय नहि। चटपट करक चाही। नहि त हाथमे आएल चिड़इ उड़ि जायत। खिड़कीक सामने एक जामुनक झंखार गाछ रहैक। दरोगाजी फुर्त्तीसॅं ओहिपर चढि गेलाह और बन्दूककें दोकठमे अड़ा कऽ एक मोटगर ठाढिपर बैसि गेलाह।

थोड़ेक कालक बाद दरोगाजी देखै छथि जे चंचला देवी खिड़कीपर आबि कऽ बैसल छथि। दरोगाजीक छाती धड़कय लगलैन्ह। तावत देखै छथि जे एक नौजवान आबि कऽ खिड़कीसॅं सटि कऽ ठाढ भऽ गेल। मुंशीजीक छाती जोर-जोरसॅं उधकय लगलैन्ह। ओ बन्दूक हाथमे लय लेलन्हि। जौं ई भागि गेल, त सभ जासूसी व्यर्थ भऽ जायत। चोरकें सेन्हपर पकड़ी तखन बहादुरी। थोड़ेक काल धरि चंचला देवी और ओहि नवयुवकमे हॅंसि-हॅंसि क। बात होइत रहलैन्ह। दरोगाजीक देहमे आगि लागि गेलैन्ह। ओ बन्दूकक निशाना ठीक कैलन्हि। तावत नवयुवक आगाँ बढि कऽ खिड़कीक भीतर हाथ पैसा देलकैन्ह। आब दरोगा जी नहि देखि सकलाह। चट दऽ फायर कऽ देलन्हि। तड़ाक दऽ बन्दूक छूटल और ओम्हर नवयुवक काटल गाछ जकाँ धम्म दऽ खसि पड़लाह।

दरोगाजी मोंछपर ताव फेरैत ओहिठाम ऎलाह त देखै छथि जे कुहराम मचल अछि। चंचला देवी खिड़कीक छड़सॅं अपन माथ-कपार फोड़ि रहल छथि।

मुंशीजीके देखि ओ और जोरसॅं विलाप करय लगलीह-हमरा भाइसॅं अहाँके कोन शत्रुता छल जे गोली मारि देलिऎक?

मुंशीजी डाँटि कऽ कहलथिन्ह-आब ई त्रियाचरित्र रहय दियऽ। हम ऎयार तेजसिंह छी। ई अहाँक भाय नहि, यार थीक!

चंचला देवी कनैत बजलीह-हे राम! अहाँ सनकि त ने गेलहुँ? आँखि अछि कि कपार! बिरजू भैयाकें नहि चिन्हैत छिऎन्ह? हाय-हाय! कोना छटपट कऽ रहल छथि? हम त बन्द छी। पानिओ कोना कऽ दिऔन्ह? कहाँसॅं एहन ठाम ऎबो कैलाह!

आब मुंशीजी टार्च लेसलन्हि त अपन सार ब्रजनाथकें देखि हतबुद्धि भऽ गेलाह। तावत महल्लाक लोक जमा भऽ गेल। ब्रगनाथकें पानि पिया कऽ होश कराओल गेलैन्ह और तुरन्त डाक्टरके बजा कऽ मलहम-पट्टी कैल गेलैन्ह। गोली पैरमे लागल रहैन्ह तैं प्राण बाँचि गेलैन्ह।

दरोगाजी सभकें यैह कहलथिन्ह जे चोरक धोखा भऽ गेल। थानासॅं चल अबैत रही। अन्हारमे खिड़कीक सामने आधा रातिकऽ ठाढ देखलिऎन्ह। भेल जे केओ छड़ काटि रहल अछि, फायर कऽ देलिऎक।

सभक चल गेलापर चंचला देवी कहय लगलथिन्ह-दुर! अहाँक बुद्धि केहन भऽ गेल? हम बिरजू भैयाके शब्द सुनि दौड़लहुँ, परन्तु बाहरसॅं ताला बन्द। भीतर अबितथि कोना? तखन हमरा लोकनि खिड़कीपर आबि कऽ गप्प करय लगलहुँ। हुनका पिआस लागल रहैन्ह। हम एक गिलास पानि देबय लगलिऎन्ह। ओ हाथ बढा कऽ लैते रहथि कि अहाँ गोली मारि देलिऎन्ह। हाय राम! हमरा लोकनि अहाँक कोन कसूर कैने छलहुँ।

मुंशीजी कहलथिन्ह-हमरा आगाँ बेशी सत्यवंती नहि बनू। ई त संयोगसॅं अहाँक भाय बीचमे आबि गेलाह, नहि त अहाँक यारक लाश एखन तड़पैत रहैत।

स्त्री कहलथिन्ह-अहाँ निट्ठाह पागल भऽ गेल छी। हमर यार के रहत?

मुंशीजी कहलथिन्ह-जकरा अहाँ आइ राति खिड़कीपर आबक हेतु बजौने रहिऎक। चंचला देवीक मुँह उड़ि गेलैन्ह। अकचका कऽ पुछलथिन्ह-हम बजौने रहिऎक?

मुंशीजी-हॅं, चिट्ठी लिखि कऽ।

चंचला पुछलन्हि-अहाँ साबित कय सकैत छी?

मुंशीजी जेबीसॅं ओ चिट बहार कऽ हुनका आगाँमे फेकि देलथिन्ह! जेना शिकार फॅंसलापर व्याधा प्रसन्न होइत अछि तहिना ओ मोंछपर ताव फेरय लगलाह।

एकाएक चंचला देवीक मुँहपर मुस्कान दौड़ि गेलैन्ह। ओ पुछलथिन्ह-ई चिट्ठी अहाँकें कतय भेटल?

मुंशीजी अपना मोंछकें मरोड़ैत कहलथिन्ह-पछुआड़क नालीमे।

चंचला देवी कहलथिन्ह-ई चिट्ठी हम छोटकी दाइकें लिखने छलिऎन्ह! पाछाँ फाड़ि कऽ फेकि देलिऎक। ओही ठाम खोजि कऽ देखिऔक, दोसरा टुकड़ा प्रायः हैबे करतैक।

जासूस राम पुनः टार्च लेसि कऽ गेलाह और एक ओहने दोसर टुकड़ा खोजि कऽ नेने ऎलाह।

चंचला देवी कहलथिन्ह-आब दुनू टुकड़ा जोड़ि कऽ देखिऔक त। दुनू टुकड़ा जोड़ल गेल त संपूर्ण चिट्ठी एहि तरहें पढल गेल-

                               परम प्रिय  छोटकी  दाइ
          सप्रेम     आलिंगन      और  स्नेहमयी         बच्चीकें
          बारंबार       मुख     चुम्बन  अहा   कहिया  आयब ?
          हम          अहाँक    ऎबाक  समाचार सुनि  प्रतिदिन
          बाट     ताकि  रहल    छी ।  अहाँक भाय आइकाल्हि
          बारह   बजे    रातिक   बाद   घर     अबैत     छथि ।
          अहाँ       आबि      जाउ  ।   तखन   सभ टा  बूझब।
          हम      व्याकुल          छी।   अहाँक   भाय    साहेब
          राति          दिन      विचित्र   संदेहक             फेरमे
          पागल       भेल          रहैत   छथि।  लिखि नहि सकै
          छी         अहाँकें        हृदय  क व्यथा की कहू लिफाफ
          मे         साटबाक        हेतु   टिकट  नहि  छल ।   तैं
          काल्हि       सँ    छटपटाइत   छलहुँ।  आइ लगा रहल
          छी । अहाँ   सँ   मिलक हेतु   हम व्यग्र   छी।  चिन्तासॅं
          छाती  धरकि  रहल  अछि ।  और कहबे ककरा करियौक?
          हम लाज खोलि कऽलिखै छी  हुनका हमरेपर सन्देह छैन्ह।
          अहाँ आबि कऽ प्राण  बचाउ।  प्रत्येक   ट्रेनक   समयमे
          हम     खिड़की  पर   बैसलि   रहैत छी से स्मरण रखने
          रहब ।  विशेष भेंट   भेलापर   कहब
                                      अहाँक  भौजी
                                      चंचला   देवी
                                      १४-३-  ४८
              

चिट्ठी पढैत देरी दरोगाजी लाजें पानि-पानि भऽ गेलाह। बजलाह-तखन आब की होमक चाही?

चंचला देवी चुपचाप उठि कऽ गेलीह और शेविंग-सेट (हजामत बनैबाक सामान) लऽ ऎलीह। तखन साबुनसॅं कुच्ची भिजा, हुनका मोंछकें खूब नीक जकाँ रगड़ि, ओहि पर नहूँ-नहूँ सेफ्टी रेजर (छुरा) चलाबय लागि गेलीह। देखैत-देखैत दरोगाजीक मोंछ साफ भऽ गेलैन्ह।