लेखक : हरिमोहन झा

एम्हर एकदिन खट्टर कका सॅं भेट भेल छल । पुछलिऎन्ह- खट्टर कका प्रशन्न छी ?

बजलाह- प्रशन्न की रहब ? सन्न छी । अपना देशक हालति देखिकऽ । सुजला, सुफला, शस्यश्यामला भूमि में हमरा लोकनि अजला अफला, सुन्यश्यामला बना देलिऎन्ह और भिक्षापात्र नेने संसार क आगाँ ठाढ छी- अन्नं देहि !

हम - खट्टर कका, एना किऎक भेलैक ?

ख०- हौ, कारण बड्ड प्राचीन छैक । वैदिके युग सॅं हमरा लोकनिक जिह्वा पर द अक्षर बैसल अछि । देहि, देहि, देहि ! पहिने इन्द्र वरुण कैं गोहरबैत छलिऎन्ह, आब अमेरिका-रुस कें । बिना उधारें हमरा लोकनिक उद्धार नहिं ।

हम- परन्तु उपनिषद् क शिक्षा----

ख०- हौ, उपनिषदो आयल त वैह अक्ष्रर नेने । द द द ! असली अर्थ (दया, दान, दमन) तऽ कोठी क कान्ह पर गेल । केवल दऽ अक्षर रहि गेल । देखै छह नहिं, वेद, उपनिषद् - दूहू क अन्त में कोन अक्षर छैक ?

हम - परन्तु अपन देश त जगद्गुरु छल ?

ख० - तैं हम आइ सभ कैं अपन गुरुमंत्र सुना रहल छिऎक - श्रद्धा देयम् । अश्रद्धा देयम् । श्रिया देयम् । ह्रिया देयम् । भिया देयम् । संविदया देयम् ।

हम - खट्टर कका, हमरा लोकनि एना याचना करी से त उचित नहिं ।

ख० - हौ, हमरा लोकनि कें मँगवा में गौरव बुझि पड़ैत अछि आदिए सॅं भिक्षा क शिक्षा भेटल अछि । की वेदान्ती, की बौद्ध, जे एलाह से भिक्षु धर्म कें कप्पार में सटने । लोक कर्म कें तुच्छ बूझि भिक्षा कें महत्व देमय लागल । संपूर्ण देश में भिक्षुकवृत्ति पसरि गेल ।वैह संस्कार एखन धरि बनल अछि ।

हम - खट्टर कका, एहि कृषिप्रधान देश में ---

ख० - हौ, कृषिप्रधान नहिं, ऋषिप्रधान कहह । हमरा लोकनि आकाशे दिस तकैत छी । आन देश क लोक पाताल सॅं पानि खिचि कऽ पटबैत अछि, तैं बारहो मास आर्द्रा नक्षत्र बनल रहैत छैक । हमरा लोकनि कें हथिया नहिं बरसल त हस्तोदके क आशा ।

हम - खट्टर कका, आइकाल्हि किछु दुबराएल देखैत छी ।

ख०- हौ, मोटाएब कथी पर ? घृत कोषे टा में रहि गेल । नाना प्रकारक व्यंजन आब वर्णमाला टा में भेटैत अछि । तखन ढेकार क स्वर कथी पर बहरायत ?

हम - आब त निमंत्रणो उठल जाइत अछि ।

ख० - निमंत्रण देत के ? कोठी ओ कोठा वला आब स्वयं कोटा क पाछाँ दौड़ि रहल छथि । रासन सुख कें रासन खा गेल । जे अनन्य मित्र छलाह से अनन्न मित्र भऽ गेलाह । अपने अन्न बिना हकन्न कानि रहल छथि ।

हम - तैं आब भोज क स्थान में 'पार्टी चलि गेल अछि ।

ख० - भोज क अर्थ होइ छल 'भरि पेट' । 'पार्टी' क अर्थ 'भरि प्लेट' । अर्थात् एक फक्का दालमोट ओ एकटा सिंहारा । ई सिंहारा आबि कऽ सोहारी-तरकारी क संहार कऽ देलक । पहिने अढेया मे चरण अखारि कऽ एक अढैया मधुर आगाँ में राखि दैत छल । आब अढाइ चमच चीनी एक चुकरी में दय ऊपर सॅं गोमूत्र-रंग क काढा चुआ दैत अचि ।

हम- हॅं , आब त सभ ठाम 'टी' -----

ख० - हौ, यैह टी त सभक टीक काटि लेलक । पहिने सौजन्य कऽ अर्थ छलैक अट्ठारह टा बाटी । आब केबल 'टी' टा रहि गेलैक । आधुनिक सभ्यता में ठोर दागि दैत छैक, भफाइत इन्होर लऽ कऽ । आचमनीयम् क स्थान मे चायमानेयम् । पहिने विवाह में टाका भेटैत छलैक । आब भेटैत छैक 'टा टा' । टी पिया कऽ टा टा कऽ देतौह । आइ काल्हुक सभ्यता बूझह तऽ ट अक्षर पर चलैत अछि - टोस्ट, टी, टेरेलिन, ट्रैंजिस्टर ओ टा टा । स्वाइत लोक टिटिया रहल अछि ।

हम - वास्तव में संस्कृति बदलि गेलैक ।

ख० - हौ, 'संस्कृति' क अर्थे बदलि गेलैक । सांस्कृतिक कार्य माने नाच । एहि हिसाबे संस्कृत क पंडित महा असंस्कृत छथि । जे बेटी-पुतहु घुघरू पहिरि कऽ नचै छथि सैह संस्कृता । 'बेबि' लोकनि माय के मम्मी (मामी) कहैत छथि और बाप कें पापा (पाप ?) । ई सभ बात पहिने गारि कहबितैक । आब कलचर कहबै छैक । आब 'चाचा' कें 'चा' पिया कऽ 'चा चा चा' डांस देखा देतैन्ह ।

हम - खट्टर कका, अहाँ त प्राचीन में घुसैत छलिऎक । आइ आधुनिक कें किऎक दुसैत छिऎक ?

ख० - हौ, हम कि ककरो नामे 'बहिखत' लिखि देने छिऎक ? हमर पित्ती मटर झा कहथिन्ह - जय जगदम्बा, जय जगदीश ! जे देत दही-चूड़ा तकरे दीस । 'जकर खैबैक, तकर गेबैक ।' से पुरना आब रहबे नहिं कैलइ । नवका सहजें एको नवका पाइ बहारे नहिं करत । तखन बजियौ ककरा दिस ?

हम - हॅं , एखन त कठिन समस्या ----

ख० - हौ, पहिने लोक फुरा-फुरा कऽ कऽ समस्या गढैत छल और पुर्ति करैत छल । आब त घृत-तेल-तण्डुल, जैह वस्तु खोजू, सैह समस्या बनि कऽ ठाढ भऽ जाइछ । हल भेटते नहिं अछि । समाधान की करब ? सामा, धान सेहो नहिं कऽ सकैत छी । कणाद बनि कऽ भाव-अभाव क विवेचन करैत रहू । आब त ठढइयो छानब से कठिन ।

हम - से किएक, खट्टर कका ?

ख० - हौ, चीनी पाताल चलि गेल । मरीच आकाश ठेकि गेल । सेहो मारीच जकाँ छद्मवेष धारण कैने । अर्नेवा क बीया संग मिझरायल । बादाम मे बहेरा क आँठी मिला दैत अछि । शोधित हरीतकी खैनाइ छोड़ि देलहुँ जे कतहु बकरी क भेराड़ी ने फेटने हो ।

हम - खट्टर कका, लोक एना ठकपनी किऎक करैत छैक ?

ख० -हौ ,पहिने सार -सरहोजि एना ठकैत छलैक । आव त सभ सर्वे - सर्वा । सर्वे भवन्तु सुखिनः में सर्वे क स्थान में सरबे बूझह शंकराचार्य कें सारे नहिं रहैन्ह । तैं संसार कें असार कहि गेलाह । हमरा त चारुकात सारे सार सुझैत अछि ।

हम - खट्टर कका ,अहाँ कें त सभ बात में परिहासे रहैत अछि । किन्तु इ नाना प्रकार क प्रपंच

ख० - हौ , वेदान्ती लोकनि त बड्ड प्रयास कैलन्हि जे नाना प्रपंच कें समाप्त कऽ दी । परन्तु नाना कें मेटा देताह से किनकर नाना क सक्क छैन्ह ? यावत पंच क अस्ति त्व रहतैन्ह , तावत प्रपंच कोना उठि सकैत अछि ?सर्वं मिथ्या क आब यैह अर्थ रहि गेल अछि जे आइकाल्हि जे आइकाल्हि जे वस्तु भेटैत अछि से सभ नकली थीक । जे भाषण होइछ से सभ फूसि थीक ।

हम - अहाँ कें लोकतंत्र में विश्वास नहिं अछि ? बहुमत त मानहि पड़त ।

ख० - हमरा ने लोक में विश्वास अछि, ने तंत्र में । पहिने स्वामी क मत चलै छलैक । आब बहु क मत चलै छैक । जेम्हर बेसी हाथ उठल । माथ क कोनो मोल नहि । ९९ विद्वान सॅं १०० मूर्खक मूल्य बेसी । एक टा सती सॅं दू टा कुलटा क महत्व अधीक । खुदरा सॅं थोक क भाव बेसी । ई लोकतंत्र भेल वा थोकतंत्र ? बूझह त ई तंत्र दुइए टा तंत्र पर चलैत अछि । भोट और नोट ।

हम - खट्टर कका, अहाँ हॅंसियो-हॅंसी में गंभीर बात कहि दैत छिऎक ।एहि देशक लोक धर्म-नीति बिसरि गेल अछि ।

ख० - देखह । चर्पटपंजरिका लैह । "अर्थमनर्थं भावय नित्यम ।" एकर अर्थ ई भऽ गेलैक अछि जे 'अर्थ' (धन) ओ तकरा प्राप्त करबाक निमित्त जतबा 'अनर्थ' भऽ सकय तकर भावना नित्य करैत रहू ।

           यावत् वित्तोपार्जन शक्तः
           तावत् निज परिवारो रक्तः
           पश्चात् जर्जरभूते देहे
           वार्ता कोऽपि न पृच्छति गेहे ।
        

एकर तात्पर्य ई जे यावत उपार्जन कऽ सकैछी तावते धरि परिवार में आदर हैत। पाछाँ जर्जर भेला पर घर में केओ बातो नहिं पूछत। तैं जतवा टाका कमा सकैछी से एखने कमा लियऽ।

          नारीस्तनभर नाभिनिवेशम्
          दृष्ट्वा  माया मोहावेशम्
          एतन्मांसवसादि विकारम्
          मनसि विचारय वारंवारम्
          भज गोविन्दं मूढमते !
        

एकर भावार्थ बुझलहौक ? युवती नारी क स्तन देखि कऽ पुरुषक मन में मोह क आवेश आबि जाइत छैक । ओ स्तन मांस क लोइया मात्र थीक । माया क एहन लीला जे ओहो मांस पर रोमांस चलैत छैक । तैं बालब्रह्मचारी शंकर क उपदेश छैन्ह जे ओहि गोलाकार मांसपिंडरूपी स्तनमंडल पर मन मे वारंवार विचार वा ध्यान करैत रहू (जाहि सॅं तत्वज्ञान क आनन्द भेटैत रहय) । और जे लोकनि मूढमति वा मंदबुद्धि होथि से गोविन्द कें भजथु ।

हम - धन्य छी, खट्टर कका । अहाँ कें त सभ बात में बिनोदे सुझैत अछि । उनटे गंगा बहा दैत छिऎक ।

ख० - हम बहबैत छिऎक कि आधुनिक महर्षि फ्रायड क चेला लोकनि बहबैत छथुन्ह ? हुनका लोकनिक सिद्धान्त छैन्ह जे चोला छूटय, लेकिन चोली नहिं छुटय । कदम्ब सॅं कदीमा धरि, सभ प्रतीके सुझैत छैन्ह । इन्द्रियनिरोध क स्थान में गर्भनिरोध करै छथि । 'मेन लाइन' छोड़ि 'लूप लाइन' धैलन्हि अछि जे भावी पीढी कूप में जा रहल अछि ।

हम - वास्तव में आब सभ बात उनटि रहल छैक ।

ख० - ताहि में कोन संदेह । पहिने पुत्रजन्म क उत्सव होइत छलैक, आब जन्मनिरोधक उत्सव होइत अछि । आधुनिक नारी "पुत्रवती भव" क स्थान में लूपवती भव, लूपवती भव" आशीर्वाद चाहैत छथि । पहिने स्वामी स्त्री क माँग भरैत छलाह । आब स्त्री स्वामी क माँग पुरैत छथिन्ह । स्वयं कमा कऽ । कतिपय 'पति' में 'त' अक्षर क योग सेहो भऽ जाइत छन्हि । पहिलुक चेला चैला चिरैत छल, आब छैला बनल फिरैत अछि । छौड़ा सभ छीट पहिरय लागल अछि, छौड़ी सभ सूट कसय लागलि अछि । पहिने ओनामासि सॅं सुरु करै छल आब सिनेमाजासी सॅं । चित्त-पट्ट पर चित्रपट अंकित रहैत छैक । रानी सभ लीडरानी बनि गेलीह । राजनेत्री लोकनि अभिनेत्री क कान काटि रहल छथि । पहिने अप्सरा होइ छलीह , आब अफ्सरा होइ छथि । 'फैशन' ओ 'पैशन' दिनदिन बढल जाइत अछि । पहिलुक नारी मंदिर में माथ नवबैत छलीह, आबक नारी माथे पर मंदिर उठबैत छथि । हौ, आब एहि युगचक्र कें के रोकि सकैत अछि ?

हम - परन्तु बुद्ध , गाँधी वा विनोवा --------

ख० - हौ, बुद्ध , गाँधी वा विनोवा क साधना कें लोक दूर सॅं प्रणाम करैत छैन्ह । लग में आनन्द लेबक हेतु फिल्म क साधना होइ छथि । गीता गेलीह । गीतावाली ऎलीह । दुर्गा गेलीह । दुर्गा खोटे ऎलीह । लोक नूतन दिस दौरैत अछि । तुलसीमाला सॅं बेसी वैजन्तीमाला क जप होइ छैन्ह । संगम में त्रिवेणी-संगम सॅं अधीक मेला देखल । केहनो अकाल रहौक, सिनेमा में त्रिकाल बसंत भेटतौह । से छोड़ि कऽ कोन अभागल त्रिकाल-संध्या करत गऽ ? हौ, युगधर्म बदलि गेलैक । रीतिकालीन (वा ऋतुकालीन?) नायिका अमृतकलश छलकबैत छलीह । एहि अरीतिकाल में नायिका क शान आलपीन क नोक पर चलैत छैन्ह । विद्यापति क पद छैन्ह - पीन पयोधर दूबरि गाता । आधुनिक फैशन देखितथि त पीन काटि कऽ पिन बना दितथिन्ह ।

हम - खट्टर कका, कतबो युग बदलौक, पैघ क महत्व रहबे करतैक ।

ख० - हौ, कतेक ठाम पैघ सॅं छोट क मूल्य बेसी होइ छैक । जेना छोटकी अणाची बड़की सॅं तेज होइ अछि । बड़ घड़ी दीवाल में टाङ्गल रहै अछि, छोटकी घड़ी सतत पहुँचे पकड़ने रहै छैक । प्रेयसी प्रायशः श्रेयसी क छाती पर सवार रहै छैन्ह ।

हम - खट्टर कका, एहि युग में एतेक भ्रष्टाचार किऎक बढि गेल छैक ?

ख० - हौ, शरीर क जे अंग अस्थिरहित (बिना हड्डी क ) होइछ, से बड्ड दुनिर्वार । जेना चारि आँगुर क जिह्वा । तैं हमरा लोकनिक पूर्वज लिंग-वचन क अनुशासन सॅं क्रिया कें मर्यादित रखै छलाह । आब त से बात व्याकरणे टा में रहि गेल अछि । एहि अणविक युग में , गाणतंत्रीय पद्धति में, उभयलिंगी व्यक्ति कें समान अधिकार भेटि गेल छैन्ह । तखन स्वच्छन्दता ओ भ्रष्टाचार क नग्ननृत्य नहिं हो , तऽ हो की ?

हमरा मूँह तकैत देखि खट्टर कका बजलाह - हौ, महाजनो येन गतः स पन्थाः । से हमरा लोकनिक 'महाजन' छथि यूरोप-अमेरिका । हुनका लीक पर चलिए रहल छी । और उपाये की ?

हम - किछु गोटाक विचार छैन्ह जे प्राच्य ओ पाश्चात्य - दूहू क समन्वय चाही । मध्यम मार्ग उत्तम होइछ ।

खट्टर कका बिहुँसैत बजलाह - हौ, मध्यम कतहु उत्तम हो ! यदि मध्यमे ग्रहण कैल जाय , तखन त युवती क पति त्रिशंकु जकाँ नाभिए में अटकल रहि जाथि ! बीचोबीच ! ने एक बीत उपर ने नीचा । तखन त माध्यमिक शून्यवादे हाथ लगतैन्ह ! --- तों भातिज थिकाह बेसी खोलि कऽ कोना कहिऔह ?

हम - खट्टर कका, अहाँ कें त सदिखन परिहासे रहैत अछि । ई कहू जे सदाचार क रक्षा कोना हैत ?

ख० - हौ, एकर ठीका तोरे भेटलौह अछि ? खूब झूर कऽ तरल मोदिनी क पलइ जकरा जीभ पर चढि चुकल छैक से उसिनल परोर दिस किएक तकतौह ? हॅं , जखन मरचाइ-मसाला खाइत-खाइत सुलबाहि उखड़ि जैतैक तखन अपने पुरान चाउर क मड़गिल जोहने भेल फिरतौह । सैह पथ्य थीक सदाचार । हौ, सदा चार पर त कहियो नहिंए रहि सकै अछि । जखन लाचार भऽ जाइ अछि, तखन सदाचार पर एनहिं कुशल । तों व्यर्थ चिन्ता किऎक करै छह ?---

हम कहलिऎन्ह - खट्टर कका, ई महॅंगी देखि तऽ किछु फुरतहि ने अछि । प्रत्येक वस्तु क भाव ----

खट्टर कका बजलाह - हौ, पहिने कवि लोकनि नव-नव भाव दैत छलाह । आब बनियाँ दऽ रहल अछि । नित्य नवीन ! आइ रुपैया में छौ कनमा चाउर त काल्हि पाँच कनमा ।

हम - खट्टर कका, आब त चाउर क अभाव में अल्हुआ क होटल खुजि रहल अछि ।

ख० - हौ, आब पार्टिओ मे कलाकंद क स्थान में शकरकंद भेटतौह । तेहन समय आबि रहल अछि, जे वर कें महुआ लऽ कऽ महुअक हैतैन्ह । चाउर क अभाव मे जनेर लऽ कऽ दूर्वाक्षत हैतैन्ह । दही क बदला पिठार लऽ कऽ चुमाओन हेतैन्ह ।

हम - वास्तव में जहाँ दूध-दहीक धार बहैत छल, तहाँ ---

ख० - तहाँ आब नदिओ सुखायल जा रहल अछि । मेघो कें जेना मुत्रावरोध भऽ गेल होइक ।

हम - खट्टर कका , किछु पंडितक कथ्य छैन्ह जे पहिने यज्ञक धुआँ उठैत छल ,तहि सँ वर्षा होइत छल ।

ख० - हौ ,आइकाल्हि लाखक लाख रेलक इंजिन ओ कारखानाक चिमनी सँ धुआँ उड़ैत रहै छैक । मशीन क कोन कथा जे लोको क मुँह सॅं धुआँ उड़ैत छैक । एतेक धुआँ त कोनो युग में नहिं उड़ैत छलैक । तखन इ धुआँधार वर्षा होमक चाही ?

हम - किछु गोटे कहै छथि जे लोक क पाप सॅं मेघ नहिं बरसैत अछि ।

ख० - हौ, यदि मेघ में एतबा बोध रहितैक त चोर बाजार पर बज्र खसबैत । से त होइछे नहिं , खट्टर कका क इनार चटाएल जा रहल छैन्ह ! खेत खाय गदहा, मारि खाय जोलहा !

हम - खट्टर कका, यैह देश थीक जहाँ ताला लगाएब लोक व्यर्थ बुझैत छल ।

खट्टर कका विहुँसैत बजलाह - हौ, ताला लगाएब त आइयो व्यर्थे बूझि पड़ैत अछि । जैखन मौका भेटितैक, तोड़िए देत । तखन त धातु पाठ में सभ सॅं बेसी चुरादिगण क चलती छैक ।

हम - एखन लोक पाइक हेतु कोन कर्म नहिं करै अछि ?

ख० - पाइ खातिर एहि 'डालडा युग ' में घी क कोन कथा जे स्त्री पर्यन्त खाँटी नहिं भेटतौह ।

हम - आइकाल्हि लोक क मन में शान्ति नहिं छैक । बात-बात में हड़ताल ! खट्टर कका, ई हड़ताल पहिने छलैक ?

ख० - हौ , पहिने बनिया अन्याय करैत छलैक त राजाक दिस सँ हट्टताल होइक अर्थात हाट में ताला लागि जाइक । आब त हर (महादेव ) क ताल जकाँ कखन कोन बात पर तांडव मचि जाएत तकर ठेकान नहिं । ई हरताल बूझह त गीता पर हरताल फेरि देलक ।

हम - से कोना ,खट्टर कका ?

ख० - देखह, गीता क मूलमंत्र छैक -

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन ।

एहि युग क मंत्र भऽ गेलैक -

फलेष्वेवाधिकारस्तु मा कर्मणि कदाचन ।

हम - आब त अफसर लोकनि कें घेराव-पथराव होमय लगलैन्ह अछि । ई सभ पहिने छलैक ?

ख० - हौ, एक बेर अक्रुर क घेराव भेल रहैन्ह । गोकुल क ब्रजबाला लोकनि रथ कें घेरि नेने रहथिन्ह । आब त क्रुर सॅं क्रुर हाकिम कें घेराव क डर सॅं पेट में केराव फूटय लगलैन्ह अछि । एहि देश में अन्नक भरि ठेहुन पथार लागल रहैत छलैक । तखन लोक लथार किऎक मारितैक ? आब पथार उठि गेलैक, पथराव आबि गेलैक । एकरा बाद नहिं जानि की सभ आओत - उठाव ,पटकाव ----

हम - खट्टर कका, लोक क पेट भरल रहतैक त एना नहिं करत । आब खेती दिस ---

ख० - हौ, खेती और के करतौह ? जे हर जोतैत छल, से शहर दिस मुँह कैलक । बीया बाओग करैत छल से बी० ए० करय लागल । बूट उखाड़ैत छल से बूट लगाबय लागल । बुशशर्ट पहिरि कऽ पहिरि कऽ कुर्सी पर बैसत कि हेंगा पर ?ओकर स्त्री आब नायलोन-साड़ी में खेसारी कोना खोंटतैक ? कृषक समुदाय कर्षण छोड़ि आकर्षण दिस दौड़ल जा रहल अछि । समाज सॅं खेतीहर वर्ग लुप्त भऽ जायत । रहि जायत केवल ट्रेक्टर ओ कंट्रेक्टर ।

हम - खट्टर कका, आब त अपनहिं हाथ सॅं खेती करय पड़त ।

ख० - हौ, हम आब कलम छोड़ि कोदारि धरब , से पार लागत ? एक गाय अछि , से बलाय भेल अछि । चारा बिना लाचार छी । आइकाल्हि मरद होय से बड़द पोसय । तखन बटाइ नहिं लगावी त उपाये की ?

हम - परन्तु आब त बटाइ-प्रथा समाप्त भऽ रहल अछि ।

ख० - तकर अर्थ जे खट्टर झा स्वयं जा कऽ मट्टर रोपथु गऽ । विद्वान लोकनि खेत मे जा कऽ ढेप फोड़थु नहि त ढेप लऽ कऽ अपन कपार फोड़थु ।

हम - सरकार क नीति छैक - जे जोतय तकरे खेत ।

ख० - तखन त जे चराबय, तकरे गाय ! जे हाँकय , तकरे गाड़ी ! जे बहिंगा उठाबय , तकरे भार । जे महफा ढोबय , तकरे कनियाँ । वाह रे नीति ! जकर ठेंगा , तकर महिष !

हम - खट्टर कका, एखन सहकारिता क युग छैक ।

खट्टर कका व्यंग्यपूर्वक बजलाह - तैं बटाइ क प्रथा खटाइ मे जा रहल अछि । हौ, एक गोटा क भूमि दोसर क परिश्रम । दूहू पारस्परिक सहयोग सॅं बाटिकऽ खाइत अबैत अछि , एहि मे सरकार क की बिगड़ैत छैन्ह ? वर-कनियाँ राजी । बीच में ददाजी !

हम - खट्टर कका, अखबार में एकटा समाचार पढलिऎक अछि ? संपूर्ण दरभंगा जिला दान भऽ गेल ।

ख० - हौ, कनेक बुझा कऽ कहह । के ककरा दान कऽ देलकैक ? हम सभ कतय गेलहुँ ?

हमरा मुँह तकैत देखि खट्टर कका बजलाह - हौ, पहिने ई कहह जे दरभंगा जिला छैन्ह किनकर ? और ओ ककरा नामे दानपत्र लिखि देलथिन्ह ? कि राजा हरिश्चन्द्र जकाँ हुनको केओ विश्वामित्र भेटि गेलथिन्ह अछि जिनका कुश-तिल-गंगाजल लऽ कऽ ---

हम- से बात नहि छैक ।

ख० - तखन दान भेलैक कोना ? यदि केवल शब्दे सॅं होइक त वचने का दरिद्रता ? जाह हम संम्पूर्ण देश दान कऽ देल ।

हम - खट्टर कका, किछु गोटा क सिद्धान्त छैन्ह जे व्यक्तिगत सम्पत्ति उठा देल जाय ।

ख० - तखन त हमर लोटो छीनि लेत । पानि कथी में पिउब ? जकरा मन हेतैक से उठा कऽ बाह्यभूमि दिस चलि जायत ।

हम - अहाँ त सभ बात हॅंसिए में उड़ा दैत छिऎक । किछु गोटा क विचार छैन्ह जे सामूहिक रूओ सॅं खेती हो ।

ख० - तखन त साझी पोखरि बला परि भऽ जैतौह । सभ पट्टीदार बुझै छथि जे भसतैन्ह त सभक जैतैन्ह । हमरे कोन गर्ज अछि जे माटि भरु गऽ । हौ, साझी क सुइ साँघि पर चलैत छैक । यावत धरि अप्पन-अप्पन फुट्ट आश्रम रहतैक, तावत श्रम करतौह । 'स्व इदम' हटा दहौक , तखन स्वेद (घाम) किऎक बहेतौह ? एखन हम अपना बाड़ी में खटैत छी जे भाँटा खायब । यदि ओहि पर सौंसे गाम क हक भऽ जाइक तखन हमरे कोन कुकुर कटने अछि जे माथ पर पथिया उठा कऽ छाउर पटाएब गऽ । आड़ि-धूर मेटा दहौक, लोक देह नरा देतौह ।

हम - किछु गोटा क मंतव्य छैन्ह जे उत्पादन क समान रूप सॅं वितरण कैल जाय ।

ख० - कनेक परिछा कऽ कहह । हमरा बाड़ी में एकटा बेदाना बहराएल । गाम में दू सहस्र व्यक्ति छथि । तखन त एकोटा दाना हमरा नहिं भेटत । गाछ में एकटा शरबती नेबो फरळ अछि । तखन त एकैको बुंद रस किनको मुँह नहिं जैतैन्ह ।

हम - जकरा सभ सॅं बेशी आवश्यकता हैतैक, तकरा भेटतैक ।

ख० - हौ जी, एक अनार , सै बीमार । तखन त फुटय कपार ! गाछी झखैला पर ककरो कर्पुरिया आम भेटतैक ककरो नकभेमहा ! तैखन मारि बजरि जैतौह । गाम मे मछहर हैत ककरा रोहु देबहौक, ककरा गरचुन्नी ? सीरा-पुच्छी कोना बटबह ? 'समान वितरण' सुनबा में बड सुन्दर शब्द लगैत अछि , परन्तु करय लगबह त रण मचि जैतौह ।

हम - किछु गोटा क योजना छैन्ह जे गाम भरिक भोजन एकेठाम बनय ।

ख० - तखन त और रंगताल लागत ! एखन अपना-अपना घर में जकरा जे जुड़ै छैक से खाइ अछि । केओ खुद्दी, केओ खोआ । जखन समदरका टोकना चढतैक , तखन त सभ बरातीए बनि जैतौह । खुद्दीनेढा के खैतौह ? अल्हुओ कचरयबला हलुए क जोह करतौह । कनेको दू रंग भेलैक कि हुड़दुंग मचा देतौह । जहाँ ककरो आगाँ छाल्ही ----

ताबत दुरुखा में काकी कऽ कहलथिन्ह - अहाँ बैसल-बैसल छाल्ही क गप्प उड़ा रहल छी, एम्हर घर में एक दाना चाउर नहिं अछि । भानस कथी सॅं हैत ?

खट्टर कका हमरा दिस ताकि बजलाह - देखै छहुन ? ई उदयनाचार्य स्त्री सॅं कम्म नहिं छथि । रंग में भंग कऽ देलन्हि । हमर सभटा तरंग सुखा गेल ।

पुनः काकी दिस ताकि कऽ कहलथिन्ह - बेस , टका बहार करु और घैल अजबारि क राखू । भविष्यपुराण में लिखने छैक जे कलियुग मे घटेश्वर राजा हैत । अर्थात जकरा घर में एक घैल चाउर रहतैक सैह राजा कहाऔत । से आइ हम अहाँ कें घटेश्वरी रानी बना देव । नहिं त बूझब जे आइ एकादशीए थीक ।

हम - खट्टर कका, अहाँ क गप्प सुनक हेतु बहुतो लोक उत्सुक छथि । यदि आज्ञा हो त किछु टटका गप्प छपा दी ----

ख० - हौ, काका क टटका गप्प सभ केओ सुनताह , टका केओ नहिं देताह ! तखन छुच्छ बकबास कैने कोन फल ? एखन त अन्नं ब्रह्म क साक्षात्कार दुर्लभ । मधुर क भोज हो तखन ने मधुर गप्प जमय ! हम भोज क आसन पर बैसइ छी त लगै अछि जे सिंहासन वा इन्द्रासन पर बैसल होइ । जखन गप्पगप्प रसगुल्ला ओ सप्पसप्प रावड़ी हो , तखन ने गप्पसप्प सार्थक । कम सॅं कम आठ टा रसगुल्ला पर गपाष्टक जमै छैक ।

हम - परन्तु आइकाल्हि तऽ तेहन अकाल अछि जे ---

ख० - जे सभक हाल बेहाल अछि । जखन माल नहिं , त गाल कथी पर बाजत ? वैताल सभ तेहन ताल पसारने अछि जे लोक पिसीमाल भऽ रहल अछि । एहि जाल सॅं छुटकारा होइक तखन ने तर माल क गप्प हो ! नवका नचारी सुनने छह ?

हम - नहिं खट्टर कका !

ख० - तखन सुनह । केहन भेल अन्हेर ओ बाबा, केहन भेल अन्हेर !! भात भेल दुर्लभ भारत मे, सपना धान क ढेर । मकइ मखानक कान कटै अछि, अल्हुआ खाथि कुबेर । मड़ुआ मिसरिक भाव बिकाइछ, जीरक भाव जनेर । सभ सॅं बुड़िबक अन्न खेसारी, सेहो रुपैये सेर । टाका भेल ट्काही, वस्तुक हेतु मचल अछि रेड़। धर्मवला धक्का खाइत छथि, पापिक हाथ बटेर । सहसह अछि करैत साँप सन चोरबा सब केर जेर । बाबा ! अहॅंक त्रिशुल हाथ में , काज देत कोन बेर ? जनता दुख सॅं हहरि रहल अछि , ताकि दियौ कनडेर । हे हर ! अहाँ बहीर भेल छी, आबो सुनियौ टेर । ओ बाबा-----

हम कहलिऎन्ह - खट्टर कका, ई महेशवानी हमरा नोट करा दियऽ । एकदम सटीक अछि ।

खट्टर कका बजलाह - हौ, तोरा सटीक लगै छौह और हमरा चीनी क अभाव में गौडीय सम्प्रदाय क शरण लेबय पड़ैत अछि । सेहो गुड़ आब दुर्लभ । वल्ल्भाचार्य सन वेदान्ती 'मधुराष्टक' गबैत रहथि - गीतं मधुरं , पीतं मधुरं , भक्तं मधुरं , सुप्तं मधुरं । रूपं मधुरं तिलकं मधुरं , मधुराधिपतेरखिलं मधुरम् ॥ एखन एहि समय में रहितथि त सभटा 'मधुरम' बिसरि जइतैन्ह । एखन त 'चौराधिपतेरखिलं मधुरम्' । भाङ् घोरक हेतु ने चीनी अछि , ने गुड़ । छुच्छे गोला गिरै छी ।

ई कहि खट्टर कका भाङ्ग क गोला उठा कऽ मुँह में रखलन्हि और उपर सॅं एक लोटा पानि घट्ट - घट्ट पीबि गेलाह ।

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